“कॉकरोच” छाछ पीजिये ज़रूर, भले फूंक-फूंक कर 

भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई ) सूर्यकांत शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में एक मामले की सुनवाई के दौरान बेरोजगार युवाओं, व्यवस्था की आलोचना करने वालों को कॉकरोच (तिलचट्टे) और परजीवी कहा था। इस विवादास्पद टिप्पणी के बाद युवाओं में भारी आक्रोश फैला। इसके विरोध और तंज के रूप में सोशल मीडिया पर “कॉकरोच जनता पार्टी” नाम से एक बड़ा युवा नेतृत्व वाला आंदोलन खड़ा हो गया। देखते ही देखते इसके समर्थकों की संख्या दो करोड़ से भी ज्यादा हो गई। 

इतना ही नहीं, इस पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके छह जून को अमेरिका से भारत आ पहुंचे और दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपने समर्थकों के साथ उन्होंने प्रदर्शन भी किया। उनकी प्रमुख मांग है कि वर्तमान केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत बर्खास्त किया जाए। उन्होंने एलान किया कि अगर पांच दिन के भीतर प्रधान ने इस्तीफा ने दिया तो 13 तारीख को फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया जाएगा।

आखिर कौन हैं अभिजीत दीपके? कहां से अचानक प्रगट हो गये ? इनके इस तरह अचानक टपक पड़ने से 2011 में हुए अन्ना आंदोलन की यादें ताजा हो गईं। वह आंदोलन भी तब की सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुआ था और उसकी परिणति 2014 में केंद्र में कांग्रेस सरकार की विदाई, नरेंद्र मोदी की प्रधानमंत्री के रूप में ताजपोशी और दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की सरकार के रूप में हुई थी। अन्ना आंदोलन को “लोकपाल आंदोलन” के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल पास कराने की मांग को लेकर ही अन्ना हजारे के नेतृत्व में यह राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू हुआ था।

आंदोलन सफल रहा। केंद्र और दिल्ली की सरकारें बदल गईं। लेकिन जिस रूप में लोकपाल के लिए आंदोलन शुरू हुआ था वह आज तक उस स्वरूप को नहीं प्राप्त कर सका। बल्कि जिस भ्रष्टाचार से परेशान होकर जनता अन्ना आंदोलन में शामिल हुई आज उससे कई गुना ज्यादा भ्रष्टाचार व्याप्त हो चुका है। 

भारत दुनिया के भ्रष्टतम देशों में से एक हो गया है। लोगों ने देश से भ्रष्टाचार मिटाने और बेहतर बनाने के लिए अन्ना का साथ दिया था लेकिन हुआ उलटा। देश रसातल में पहुंच गया है। देश की संपत्तियां बेची जा रही हैं। देश की स्थिति 1991 से भी बदतर हो गई है। तब सोना गिरवी रखने की नौबत आई थी, आज सोना बेचने की खबरें आई हैं।

देश की संप्रभुता तक पर आंच आ चुकी है। कहा जा रहा है कि भारत अपने फैसले खुद नहीं ले पा रहा। वह अमेरिका के दबाव में है। उसके कहने पर फैसले ले रहा। आरोप है कि भारत ने अमेरिका के कहने पर पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध रोका और अब उसी के कहने पर रूस से तेल खरीदना कम किया है। इसीलिए लोग इन अभिजीत दीपके को शक की नजर से देख रहे हैं। 

उन्हें आशंका है कि यह कोई अन्ना जैसे ही छलिया तो नहीं हैं जो मौजूदा सरकार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को गलत दिशा देने के लिए आ धमके हैं ? हालांकि कुछ लोग इनमें 1974 के जेपी आंदोलन वाली संभावना भी देख रहे हैं। जिसमें जेपी ने युवाओं की मदद से तब की शक्तिशाली लौह महिला इंदिरा गांधी का सिंहासन पलट दिया था। हालांकि उस आंदोलन का लक्ष्य भी जेपी ने “संपूर्ण क्रांति” रखा था जिसका कुल मकसद सत्ता परिवर्तन तक ही सीमित रह गया था।

पर जेपी आंदोलन और अन्ना आंदोलन दोनों में एक बात कॉमन थी कि नुकसान दोनों में कांग्रेस पार्टी को ही हुआ। दोनों बार आक्रोश का फायदा उठाकर उन्हीं की सरकारों को हटाया गया। दोनों आंदोलनों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की पहले छिपी और बाद में खुली भूमिका थी। इसीलिए अभिजीत दीपके को लेकर भी शंका जताई जा रही है कि कहीं इनको लाने में भी तो संघ की भूमिका नहीं है ?

शुरू में पता चला कि अभिजीत दीपके आप से जुड़े हुए थे। कांग्रेस और बहुत सारे दूसरे लोग भी आपको भी संघ का बगलबच्चा और बीजेपी की “बी” टीम ही मानते हैं। जिस तरह से अभिजीत दीपके का देश आने पर खैर मकदम किया गया, जंतर मंतर पर प्रदर्शन करने की अनुमति दी गई, उससे इस शक की आशंका और बढ़ गई है।

इससे पहले जंतर मंतर पर किसानों ने प्रदर्शन की अनुमति मांगी थी लेकिन उन्हें नहीं आने दिया गया। उन्हें दिल्ली की सीमाओं पर ही रोक दिया गया। लेकिन जब अभिजीत दीपके ने जंतर मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति मांगी तो उन्हें एयर पोर्ट पर ही इसकी अनुमति की जानकारी दे दी गई।

अभिजीत दीपके ने अपनी पार्टी का नाम “कॉकरोच जनता पार्टी” रखा है। इसका शॉर्ट फॉर्म है सीजेपी । भारतीय जनता पार्टी का शॉर्ट नाम है बीजेपी। दोनों नामों में कितनी साम्यता दिख रही है। बीजेपी, सीजेपी। आपको याद होगा कांग्रेस नेता कमल नाथ ने एक बार उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश के लिए कहा था कि कौन अखिलेश, फखिलेश। वैसे ही कुछ बीजेपी, सीजेपी भी लग रहा है। शायद इसीलिए हरियाणा के बीजेपी नेता और राज्य सरकार में वरिष्ठ मंत्री अनिल बिज ने सीजेपी को अपना नाम बदलने की सलाह दी है। शायद उन्हें लगा हो कि कहीं लोग अखिलेश, फखिलेश की तर्ज पर बीजेपी, सीजेपी न कहने लगें।

अभिजीत दीपके के संघ के करीब होने की आशंका इस बात से भी पैदा होती है कि गोदी मीडिया ने इन्हें और इनके आंदोलन को हाथों हाथ लिया है। कांग्रेस का तो यहां तक कहना है कि उसकी युवा इकाई ने परचे लीक होने के खिलाफ देश के कई शहरों में बड़े-बड़े प्रदर्शन किये। लेकिन वो खबरें गोदी मीडिया ने नहीं दिखाईं। जबकि अभिजीत दीपके की खबर को खूब हाईलाइट किया गया।

लेकिन अभिजीत जो भी हों अभी तो ये सरकार के खिलाफ युवाओं की आवाज को ही बुलंद कर रहे हैं। इनके इतिहास के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है, सिर्फ इसलिए इनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। बल्कि ये भी सरकार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, इसलिए इन्हें भी समर्थन ही दिया जाना चाहिए। ये क्या बात हुई कि कांग्रेस युवाओं के पक्ष में आवाज दे तो उसको लोग समर्थन दें और अभिजीत दीपके आवाज दें तो उसका विरोध किया जाए। यह ठीक नहीं है।

अभी तक अभिजीत दीपके ने कोई ऐसी बात नहीं कही है जिससे उन पर शक किया जाए। उन्होंने शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर प्रदर्शन किया है, संविधान की रक्षा की बात की है, बाबा साहब भीमराव अंबेडकर को याद किया है, हिंदू-मुस्लिम एकता की भी वकालत की है। तो यह सब तो वही बातें हैं जो कांग्रेस, दूसरे विपक्षी दल और धर्म निरपेक्ष लोग भी कर रहे हैं। बावजूद इसके अन्ना आंदोलन के दूध से मुंह जल गया है तो अभिजीत दीपके की छाछ को पीजिये भले ही फूंक फूंक कर। इन पर नजर भी रखिये।

ताकि ये चाहें भी तो सत्ता पक्ष की दलाली न कर सकें। बावजूद इसके अगर ये दलाली पर उतरते हैं तो इन्हें युवाओं और जनता के सामने नंगा करिये। लेकिन फिलहाल इनका विरोध करना उचित नहीं लग रहा। जिस तरह से प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और सीपीआई (एमएल) लिबरेशन के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने आंदोलन में शिरकत की है उसी तरह से बाकी राजनैतिक दलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी अभिजीत के आंदोलन को समर्थन देना चाहिए।

(अमरेंद्र कुमार राय वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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